शास्ता: न्याय और अधर्म के दंडदाता रुद्र
शास्ता भगवान शिव के एकादश रुद्रों में वह स्वरूप है, जो न्याय, अनुशासन, और अधर्म के विनाश का प्रतीक है। "शास्ता" का अर्थ है "जो शासन करता है" या "जो अनुशासन स्थापित करता है।" यह स्वरूप भगवान शिव के न्यायप्रिय और त्वरित निर्णय लेने वाले स्वभाव का द्योतक है। शास्ता का उद्देश्य अन्याय, अधर्म, और अराजकता का दमन कर धर्म और सत्य की स्थापना करना है।
शास्ता का शास्त्र सम्मत वर्णन
शिव महापुराण, स्कंद पुराण, और मार्कंडेय पुराण में शास्ता स्वरूप का उल्लेख मिलता है। यह रूप सृष्टि में न्याय की स्थापना और अन्याय के दंड का प्रतिनिधित्व करता है। जब सृष्टि में धर्म की मर्यादा टूटने लगती है, तब भगवान शिव शास्ता रूप में प्रकट होकर अधर्म का नाश करते हैं।
कथा:
द्वापर युग में धरती पर "दुर्जनासुर" नामक एक असुर का आतंक था। उसने अपनी मायावी शक्तियों से धर्म और सत्य का नाश करना शुरू कर दिया। उसकी ताकत से देवता और ऋषि भी भयभीत हो गए। दुर्जनासुर ने अपनी शक्ति का उपयोग कर न्याय व्यवस्था को नष्ट कर दिया और अधर्म का साम्राज्य स्थापित कर लिया।
देवताओं और ऋषियों ने भगवान शिव की तपस्या की और उनसे सहायता मांगी। भगवान शिव ने उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हुए "शास्ता" रूप धारण किया। शास्ता रूप में भगवान शिव न्याय के प्रतीक के रूप में प्रकट हुए। उनका स्वरूप तेजस्वी और अडिग था। उनके हाथ में दंड (शासन का प्रतीक) था, और उनकी उपस्थिति से संपूर्ण ब्रह्मांड में अनुशासन स्थापित हुआ।
शास्ता ने दुर्जनासुर का सामना किया और उसे उसके पापों के लिए दंडित किया। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि उसके दुष्कर्मों का फल पूरी तरह से उसे मिले। दुर्जनासुर के विनाश के बाद, शास्ता ने धर्म और न्याय की मर्यादा पुनः स्थापित की।
शास्ता का संदेश
शास्ता स्वरूप यह सिखाता है कि अधर्म और अन्याय का अंत अवश्यंभावी है। सृष्टि में न्याय और सत्य की स्थापना ही धर्म का सबसे बड़ा उद्देश्य है। इस स्वरूप से यह शिक्षा मिलती है कि शक्ति का उपयोग सदैव न्याय और सत्य के लिए किया जाना चाहिए।
आराधना और महत्व
शास्ता की पूजा से व्यक्ति को सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। यह स्वरूप अनुशासन, न्याय, और आत्मिक शक्ति का प्रतीक है।
शास्ता को समर्पित मंत्र:
1. "ॐ शास्त्राय नमः।"
2. "ॐ न्यायाधिपतये शास्त्राय धीमहि तन्नः शिवः प्रचोदयात्।"
पूजा का फल
जीवन में न्याय और सत्य की स्थापना होती है।
व्यक्ति को अन्याय का सामना करने का साहस मिलता है।
अनुशासन और आत्म-नियंत्रण में वृद्धि होती है।
शास्ता का ध्यान और आराधना हमें यह प्रेरणा देता है कि धर्म और सत्य की राह पर अडिग रहना ही जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है। न्याय का यह स्वरूप सिखाता है कि जो भी अधर्म और अन्याय करता है, उसे उसके कर्मों का दंड अवश्य मिलता है।

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