भव भगवान शिव का वह रूप है जो सृष्टि के आरंभ, जीवन के संरक्षण और अंत का प्रतिनिधित्व करता है
भव भगवान शिव का वह रूप है जो सृष्टि के आरंभ,
जीवन के संरक्षण और अंत का प्रतिनिधित्व करता है। "भव" शब्द का अर्थ है "होना" या "सृष्टि का उद्भव"। शिव का यह रूप सृजन, पालन और विनाश के चक्र को दर्शाता है। यह जीवन की निरंतरता और समग्रता का प्रतीक है।
पौराणिक कथाएं
1. सृष्टि का आरंभ
प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, जब सृष्टि का आरंभ हुआ, तो भगवान शिव ने अपने "भव" स्वरूप में सृष्टि का निर्माण किया। यह माना जाता है कि शिव ने अपनी योगमाया के माध्यम से प्रकृति और जीवों का सृजन किया। शिव के इस स्वरूप ने ब्रह्मा और विष्णु को प्रेरित किया कि वे सृष्टि और पालन का कार्य संभालें।
2. अर्धनारीश्वर की कथा
भव रूप में शिव और शक्ति (पार्वती) एक साथ मिलकर सृष्टि की संकल्पना करते हैं। अर्धनारीश्वर रूप सृजन और पालन की अद्वितीय कथा है, जिसमें शिव और शक्ति एकाकार होकर प्रकट होते हैं। यह ब्रह्मांड में पुरुष और प्रकृति के सामंजस्य का प्रतीक है।
3. दक्ष प्रजापति और सती की कथा
दक्ष प्रजापति के यज्ञ में सती के आत्मदाह के बाद, भव रूप के शिव ने अपनी योगिक ऊर्जा से सती को पुनः पार्वती के रूप में जन्म दिया। यह कथा जीवन के चक्र और पुनर्जन्म की शक्ति को दर्शाती है, जिसमें शिव सृष्टि के पालनकर्ता और संरक्षक के रूप में उपस्थित होते हैं।
4. अमृत मंथन में योगदान
जब समुद्र मंथन के दौरान हलाहल विष उत्पन्न हुआ, तो भगवान शिव ने भव रूप धारण कर उसे ग्रहण किया ताकि सृष्टि की रक्षा हो सके। उनके इस स्वरूप ने जीवन के रक्षक के रूप में उनकी भूमिका को प्रकट किया।
भव के प्रमुख मंत्र
1. "ॐ नमः शिवाय"
यह पंचाक्षरी मंत्र भव स्वरूप की आराधना के लिए सर्वाधिक प्रभावशाली है। यह मंत्र शिव के संपूर्ण स्वरूप को समर्पित है।
2. "ॐ भवे नमः"
यह विशेष मंत्र भव रूप की कृपा और सृजन की शक्ति प्राप्त करने के लिए जपा जाता है।
3. "ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।।"
यह महामृत्युंजय मंत्र भव रूप में जीवन और मृत्यु के चक्र को संतुलित करने के लिए जप किया जाता है।
भव स्वरूप की साधना
साधना की प्रक्रिया:
1. स्थान का चयन
साधना को शांत और पवित्र स्थान पर करना चाहिए, जैसे कि शिव मंदिर, गंगा तट, या घर में विशेष पूजन स्थल।
2. पूजन सामग्री
बिल्वपत्र, सफेद फूल, अक्षत (चावल), गंगाजल, धूप, दीपक और शिवलिंग की स्थापना आवश्यक है।
3. ध्यान और जप
साधक को ध्यानमग्न होकर शिव का ध्यान करना चाहिए। मंत्र का उच्चारण धीमी गति और ध्यानपूर्वक करना चाहिए।
4. अभिषेक
शिवलिंग पर जल, दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से अभिषेक करें।
साधना का समय:
प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4-6 बजे)
शिवरात्रि या प्रदोष व्रत के समय विशेष प्रभावी होती है।
भव का महत्व
भगवान शिव का "भव" स्वरूप यह दर्शाता है कि जीवन और मृत्यु, सृजन और विनाश, सभी एक ही चक्र के भाग हैं। शिव के इस रूप की आराधना हमें जीवन के सत्य को समझने, सृजनात्मक ऊर्जा को जागृत करने और सृष्टि के प्रति कृतज्ञता का भाव उत्पन्न करने की प्रेरणा देती है।
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