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यह सच है कि वेलेंटाइन डे को वैश्विक स्तर पर बड़े पैमाने पर मनाया जाता है, जबकि शहीदों की शहादत को उतना महत्व नहीं दिया जाता, जितना दिया जाना चाहिए। इसके पीछे कई सामाजिक, सांस्कृतिक और व्यावसायिक कारण हैं।
1. वेलेंटाइन डे का प्रचार और व्यावसायीकरण
- वेलेंटाइन डे मूल रूप से सेंट वेलेंटाइन के बलिदान से जुड़ा था, लेकिन धीरे-धीरे इसे प्रेम और रोमांस से जोड़ दिया गया।
- पश्चिमी देशों में बड़ी कंपनियों (गिफ्ट, कार्ड, चॉकलेट और फैशन ब्रांड्स) ने इसे एक व्यावसायिक त्यौहार बना दिया, जिससे यह पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गया।
- सोशल मीडिया और विज्ञापन इसे और बड़ा बना देते हैं।
2. शहीदों की अनदेखी: इतिहास और शिक्षा की भूमिका
- भारत में भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान अमूल्य है, लेकिन आज़ादी के बाद शिक्षा और मीडिया में इनकी कहानियों को उतना प्रमुखता से नहीं दिखाया गया, जितना जरूरी था।
- स्कूलों में भी शहीदों की गाथा सीमित दायरे में पढ़ाई जाती है, जिससे नई पीढ़ी तक उनकी विचारधारा और बलिदान की सही समझ नहीं पहुँचती।
3. सरकार और समाज की भूमिका
- शहीद दिवस (23 मार्च) और अन्य बलिदान दिवसों को राष्ट्रीय स्तर पर मनाने की परंपरा बहुत सीमित है।
- मीडिया और सरकार केवल 15 अगस्त और 26 जनवरी को ही शहीदों को याद करते हैं, जबकि अन्य दिनों में उनके योगदान पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता।
4. सामाजिक चेतना और प्राथमिकताएँ
- आज की युवा पीढ़ी ग्लोबल कल्चर से प्रभावित है और मनोरंजन, फैशन और सोशल मीडिया ट्रेंड्स को अधिक महत्व देती है।
- देशभक्ति और क्रांतिकारी विचारधारा को सिर्फ किताबों तक सीमित कर दिया गया, जबकि इसे जीवन में लागू करने की जरूरत है।
क्या किया जाना चाहिए?
- 23 मार्च (शहीद दिवस) को राष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित किया जाए और इसे सरकारी अवकाश घोषित किया जाए।
- स्कूलों और कॉलेजों में भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु जैसे क्रांतिकारियों की विचारधारा पर आधारित कार्यक्रम किए जाएँ।
- मीडिया और सोशल मीडिया पर शहीदों से जुड़ी कहानियों को अधिक स्थान मिले, ताकि नई पीढ़ी उनकी कुर्बानियों को समझ सके।
- व्यक्तिगत स्तर पर भी हम अपने परिवार और दोस्तों के साथ शहीदों को याद करें और उनकी सोच को आगे बढ़ाएँ।
निष्कर्ष
वेलेंटाइन डे का प्रचार इसलिए अधिक है क्योंकि इसे व्यावसायिक रूप से भुनाया जाता है, जबकि शहीदों की कुर्बानी को वह स्थान नहीं मिल पाया, जो मिलना चाहिए। अगर हम अपनी सोच बदलें, जागरूकता बढ़ाएँ और शहीदों के विचारों को अपनाएँ, तो हम उनके बलिदान को सही मायने में सम्मान दे सकते हैं।

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