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भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी: कारण, प्रक्रिया और ऐतिहासिक संदर्भ
23 मार्च 1931 की तारीख भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण दिवस के रूप में दर्ज है। इसी दिन ब्रिटिश सरकार ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर सेंट्रल जेल में फाँसी पर लटका दिया। उनकी फाँसी का कारण केवल एक हत्या का मामला नहीं था, बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ उनके क्रांतिकारी विचार और उनके द्वारा चलाया गया आंदोलन था, जिसने अंग्रेज़ी हुकूमत को झकझोर कर रख दिया था।
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी क्यों दी गई?
1. सांडर्स हत्याकांड (1928)
लाला लाजपत राय पर पुलिस अधीक्षक जेम्स ए स्कॉट द्वारा किए गए लाठीचार्ज से उनकी मृत्यु हो गई थी। इसका बदला लेने के लिए भगत सिंह, राजगुरु और उनके साथियों ने 17 दिसंबर 1928 को गलती से जेम्स स्कॉट के बजाय पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की गोली मारकर हत्या कर दी।
2. असेंबली बम कांड (1929)
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को ब्रिटिश संसद में पारित होने वाले दमनकारी कानूनों के विरोध में दिल्ली स्थित सेंट्रल असेंबली (अब संसद भवन) में बम फेंका। यह बम ऐसा था कि कोई जान न जाए, लेकिन ब्रिटिश हुकूमत को संदेश मिले। उन्होंने बम फेंकने के बाद अपनी गिरफ्तारी दी और कोर्ट में क्रांतिकारी विचारधारा को प्रचारित किया।
कैसे हुई फाँसी की सजा?
1. मुकदमा और ब्रिटिश सरकार का फैसला
- भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु पर लाहौर षड्यंत्र केस के तहत मुकदमा चलाया गया।
- यह मुकदमा ब्रिटिश सरकार द्वारा बेहद जल्दी निपटाने की कोशिश की गई।
- 7 अक्टूबर 1930 को अदालत ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी की सजा सुना दी।
2. फाँसी की तिथि बदली क्यों गई?
- पहले फाँसी 24 मार्च 1931 को होनी थी, लेकिन ब्रिटिश सरकार को डर था कि यदि इस तारीख तक इंतजार किया गया, तो भारी जनाक्रोश और विद्रोह हो सकता है।
- इसलिए फाँसी की तारीख को एक दिन पहले यानी 23 मार्च 1931 कर दिया गया।
कैसे दी गई फाँसी?
- 23 मार्च 1931 की शाम लगभग 7:30 बजे लाहौर सेंट्रल जेल में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी पर लटका दिया गया।
- कहा जाता है कि भगत सिंह ने फाँसी के समय ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे लगाए और मुस्कुराते हुए मौत को गले लगाया।
- फाँसी देने के बाद ब्रिटिश अफसरों को डर था कि जेल के बाहर मौजूद भीड़ उग्र हो सकती है, इसलिए उनके शवों को चोरी-छिपे जलाने की कोशिश की गई।
- लेकिन जैसे ही जनता को इसकी खबर लगी, हजारों लोग वहां पहुँच गए और उनकी अस्थियों को श्रद्धांजलि दी।
फाँसी के बाद भारत में असर
- भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फाँसी ने देशभर में आज़ादी के संघर्ष को और तीव्र कर दिया।
- गांधी जी पर भी सवाल उठाए गए कि उन्होंने भगत सिंह की फाँसी रोकने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए।
- ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा पूरे भारत में गूंजने लगा और यह स्वतंत्रता संग्राम का प्रमुख नारा बन गया।
निष्कर्ष
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत सिर्फ एक घटना नहीं थी, बल्कि यह एक चिंगारी थी जिसने स्वतंत्रता संग्राम को और तेज कर दिया। उनकी कुर्बानी आज भी भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणा बनी हुई है।
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फाँसी से जुड़ी कुछ और महत्वपूर्ण जानकारियाँ
1. क्या गांधी जी चाहकर फाँसी नहीं रोके ?
भगत सिंह की फाँसी को रोकने के लिए पूरे भारत में अपील की जा रही थी। कई क्रांतिकारी और आम नागरिक चाहते थे कि महात्मा गांधी इस मामले में हस्तक्षेप करें और वायसराय लॉर्ड इरविन से भगत सिंह की फाँसी को रोकने के लिए बात करें।
- गांधी-इरविन समझौता (5 मार्च 1931) के दौरान भी गांधी जी ने भगत सिंह की फाँसी को रोकने की बात उठाई थी, लेकिन वायसराय ने यह कहकर इनकार कर दिया कि कानून के अनुसार उन्हें फाँसी दी जानी चाहिए।
- कुछ इतिहासकारों का मानना है कि गांधी जी इस मामले को और ज़ोरदार तरीके से उठा सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
- इससे कई लोगों में नाराजगी फैल गई और उन्हें "भगत सिंह का हत्यारा" तक कहा गया।
2. भगत सिंह के अंतिम क्षण
भगत सिंह के अंतिम पलों के बारे में कई ऐतिहासिक दस्तावेज और किस्से मौजूद हैं।
- जेल में जब उनसे पूछा गया कि उनकी आखिरी इच्छा क्या है, तो उन्होंने कहा, "मैं ब्रिटिश साम्राज्य को ध्वस्त होता देखना चाहता हूँ।"
- जब जेल अधिकारी उन्हें फाँसी घर की ओर ले जा रहे थे, तो वे अपने साथियों के साथ जोर-जोर से गा रहे थे:
"मेरा रंग दे बसंती चोला..." - ऐसा कहा जाता है कि जब जल्लाद ने उनके गले में फंदा डाला, तब भी वे हंसते हुए कह रहे थे:
"इंकलाब जिंदाबाद!"
3. भगत सिंह की लिखी किताबें और उनके विचार
भगत सिंह केवल क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि एक विचारक और लेखक भी थे। जेल में उन्होंने कई किताबें पढ़ीं और कुछ महत्वपूर्ण लेख भी लिखे।
- "मैं नास्तिक क्यों हूँ" – यह लेख उन्होंने जेल में लिखा था, जिसमें उन्होंने अपने तर्कवादी विचार रखे।
- कार्ल मार्क्स, लेनिन और अन्य समाजवादी विचारकों की किताबें पढ़कर वे समाजवाद के पक्षधर बन गए थे।
- वे मानते थे कि सिर्फ अंग्रेज़ों को हटाना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि समाज में असमानता और शोषण को भी खत्म करना जरूरी है।
4. अंतिम संस्कार को लेकर ब्रिटिश सरकार का भय
जब भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी दी गई, तो जेल के बाहर हजारों लोग प्रदर्शन कर रहे थे। ब्रिटिश सरकार को डर था कि अगर उनके शव परिवार को सौंपे गए, तो पूरा देश उग्र हो सकता है।
- इसलिए जेल अधिकारियों ने रातों-रात उनके शवों को लाहौर के पास सतलुज नदी के किनारे चोरी-छिपे जलाने की कोशिश की।
- जब स्थानीय लोगों को इसका पता चला, तो वे बड़ी संख्या में वहाँ पहुंचे और उनकी अस्थियों को इकट्ठा किया।
- बाद में, पूरे भारत में उनकी अस्थियों को श्रद्धांजलि दी गई।
5. भगत सिंह के विचार और विरासत
भगत सिंह केवल एक क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि वे एक विचारधारा के प्रतीक बन गए।
- उनके विचार आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा हैं।
- भारत में कई विश्वविद्यालयों, सड़कों और संस्थानों के नाम उनके नाम पर रखे गए हैं।
- 23 मार्च को "शहीद दिवस" के रूप में मनाया जाता है।
निष्कर्ष
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत सिर्फ ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोह नहीं थी, बल्कि यह भारतीय समाज में एक नए युग की शुरुआत थी। उनकी विचारधारा केवल स्वतंत्रता तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे एक समानतावादी और न्यायसंगत समाज का सपना देख रहे थे।
उनकी कुर्बानी को आज भी याद किया जाता है, और उनके नारे "इंकलाब जिंदाबाद" हमेशा गूंजते रहेंगे!

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